विभूति: मूर्तिपूजा, अंधविश्वास और पाखंड के घोर विरोधी थे स्वामी दयानंद सरस्वती

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    गुजरात की मोरबी रियासत में स्थित एक गांव टंकारा में जन्मा मूलशंकर नामक बालक भी शिवरात्रि को मंदिर में रात भर जागकर भगवान शिव के संकीर्तन में शामिल होने अपने माता-पिता के साथ आया था। अर्द्धरात्रि होते-होते सभी भक्तगण एक-एक कर गहरी नींद सो गए लेकिन मूलशंकर यह समझते हुए कि भगवान भोलेनाथ रात्रि में दर्शन देते हैं, एकटक शिवलिंग पर आंखें गड़ाए जागते रहा। उसकी धारणा थी कि भगवान शिव आयेंगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे लेकिन उसने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं। चूहे शिवलिंग के आसपास, शक्ति और ऊपर चढ़कर वहां रखे फलों को कुतर रहे हैं।
    बस इसी एक छोटी-सी घटना ने बालक मूलशंकर के भीतर क्रांति मचा दी। वह सोचने लगा कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह लोगों की रक्षा क्या करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की। उनका तर्क था कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए। इसी उहापोह में वह सत्य की खोज में घर से निकल गया।
    उसकी खोजी प्रवृत्ति उसे दंडीस्वामी बिरजानंद की शरण में वृंदावन ले गई जिन्होंने उसे मूलशंकर से स्वामी दयानंद सरस्वती के रूप में ढाल कर विश्वविख्यात बना दिया।
    स्वामी दयानंद सरस्वती आजीवन मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए लोगों को वैदिक शिक्षा की ओर प्रवृत्त करते रहे। उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की और वेदों के पठन-पाठन पर जोर दिया। उनका प्रमुख नारा था—’वेदों की ओर लौटो।’ उन्होंने वेदों का भाष्य किया इसीलिए उन्हें ‘ऋषि’ कहा जाता है। महर्षि दयानंद सरस्वती ने ही सबसे पहले 1876 में ‘स्वराज्य’ का नारा दिया जिसे बाद में बाल गंगाधर तिलक ने आगे बढ़ाया।
    महर्षि दयानन्द ने तत्कालीन समाज में फैली कुरीतियों, अंधविश्वासों, रूढ़ियों तथा पाखंड का प्रबल विरोध किया। वे जन्मना जाति, बाल विवाह और सती प्रथा के घोर विरोधी थे और कर्म के आधार पर वेदानुकूल वर्ण-निर्धारण की बात करते थे। वे दलितोद्धार, विधवा विवाह तथा स्त्रियों की शिक्षा के पक्षधर थे लेकिन वर्तमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान तथा पाकिस्तान में चले गए पंजाब क्षेत्र के अलावा रूढ़ियों में बुरी तरह जकड़े शेष भारत के हिंदुओं पर उनकी बातों का कोई विशेष असर नहीं हुआ।
    समाज को पुरातनपंथी विचारों, कुरीतियों, अंधविश्वासों, रूढ़ियों तथा पाखंड के मकड़जाल में फंसाये रखकर उन्हें सत्य से विमुख करने से जिन्हें लाभ होता है वे कभी नहीं चाहते कि लोग सच्चाई को जानें। इसके लिए वे निरंतर झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल फैलाकर लोगों को भ्रमित किये रखते हैं। यही कारण है कि पिछले तीन दशकों से देश को राम मंदिर निर्माण के बहाने मथ दिया गया है। लोगों की हालत ऐसी बना दी गई है कि उनकी सोचने-समझने की शक्ति कुंद हो गई है। ‘राम लला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे’ जैसे नारों का औचित्य क्या है? क्या राम किसी मंदिर जैसी नाशवान चीज के आश्रित या वहीं तक सीमित हैं? क्या यह तथाकथित ‘रामधुन’ भक्ति है? क्या राम को राजसत्ता के आश्रय की जरूरत है या राम को राजसत्ता की सीढ़ी बनाया जा रहा है? क्या यह समझने में हिन्दुओं की मेधा शक्ति नाकाम और समाप्तप्राय है? क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुओं का ठेकेदार है? क्या संघ का सरसंघचालक शंकराचार्य और वेदों से भी ऊपर है? क्या हिंदुओं को संघ के पीछे भेड़चाल चलना चाहिए?
    इन जैसे तमाम सवालों पर आज प्रत्येक हिंदू को गंभीरता से सोचना चाहिए क्योंकि हिंदुओं की सनातन परंपरा ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता के लिए संघ एक बहुत बड़ा खतरा बनकर सामने खड़ा है।
    (श्याम सिंह रावत की फेसबुक वॉल से साभार)