इत्तेफ़ाक: जस्टिस (सेवानिवृत्त) अरुण मिश्रा के न्यायिक फैसलों से जुड़े इत्तफाकों की कथा

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    श्याम सिंह रावत

    मुं बईया फिल्म जॉली एलएलबी-2 देखी है आपने? उसमें अक्षयकुमार एक वकील हैं और फर्जी इन्काउंटर के आरोपी इंस्पैक्टर सूर्यवीर सिंह (कुमुद मिश्रा) के इत्तफाकों की डीटेल कोर्ट को बताते हैं। यहां फिल्मी नहीं असली कोर्ट (सुप्रीम) के सेवानिवृत्त जज अरुण मिश्रा के न्यायिक फैसलों से जुड़े इत्तफाकों की बात की जा रही है।

    पहले बात वर्ष 2018 की, जब सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सुप्रीम कोर्ट में चल रही व्यवस्था की आलोचना करते हुए आरोप लगाया था कि मुख्य मामलों को ख़ास जजों की बेंच में लिस्ट किया जा रहा है। ऐसे आरोप लगाने वालों में पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस कुरियन जोज़फ़ और जस्टिस चेलमेश्वर शामिल थे। क्या ऐसा आरोप सही था और यह जानबूझ कर किया जा रहा था या महज़ इत्तफ़ाक़न था?

    अब देखिये इत्तफ़ाक़ नंबर―1
    नरेंद्र मोदी के लाड़ले गौतम अडाणी के ऊपर भ्रष्टाचार, कर चोरी और भूमि अधिग्रहण के 7 मुक़दमे सुप्रीम कोर्ट में चले। ये सातों मुक़दमे इत्तफ़ाक़न भाजपा शासित प्रदेशों के थे जिनमें सरकार और अडाणी की मिलीभगत के आरोप थे। इत्तफ़ाक़ से सभी मुक़दमे एक-एक करके पिछले 6 सालों में अरुण मिश्रा जी की कोर्ट में आए और इत्तफ़ाक़ से ही सभी के फ़ैसले अडाणी के हक़ में गए।
    इत्तफ़ाक़ नंबर―2
    वरीयता सूची में 10वें स्थान पर मौजूद जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा की खंडपीठ के सामने गुजरात के चर्चित हरेन पांड्या हत्याकांड का मामला आया। खंडपीठ ने गुजरात उच्च न्यायालय के फ़ैसले को ख़ारिज कर दिया था।
    इत्तफ़ाक़ नंबर―3
    अरुण मिश्रा बहुचर्चित ‘सहारा बिरला दस्तावेज़’ मामले की सुनवाई करने वाली खंडपीठ के सदस्य थे। इस मामले में भी राजनेताओं, नौकरशाहों और जजों पर भी आरोप लगे थे लेकिन मामला ख़ारिज हो गया था।
    इत्तफ़ाक़ नंबर―4
    सुप्रीम कोर्ट में जज लोया की मौत की जाँच का केस आया और जिसमें कोर्ट ने मौत की जाँच से इंकार कर दिया था। हालांकि बाद में जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा ने ख़ुद को जस्टिस लोया मामले से ‘रेक्युज़’ यानी अलग कर लिया था।
    इत्तफ़ाक़ नंबर―5
    मेडिकल कॉलेज घूस कांड का मामला भी जस्टिस अरुण मिश्रा की खंडपीठ के सामने आया, जिससे तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने ख़ुद को अलग कर लिया था। याचिका में पूरे मामले की जाँच करने का अनुरोध किया गया था लेकिन उसे ख़ारिज कर दिया गया।
    इत्तफ़ाक़ नंबर―6
    IPS अधिकारी संजीव भट्ट की PIL जिसमें उन्होंने गुजरात में उनके ख़िलाफ़ दर्ज FIRs के लिए एक स्वतंत्र SIT की माँग की थी, वह भी मिश्रा जी ने ही रिजेक्ट की थी।
    इत्तफ़ाक़ नंबर―7
    CBI निदेशक आलोक वर्मा को हटाकर रातों-रात नागेश्वर राव को CBI का निदेशक बनाने के विरोध में डाली गयी PIL पर सुनवाई अरुण मिश्रा जी ने की जो निरस्त हो गयी।
    इत्तफ़ाक़ नंबर―8
    2018 के भीमा कोरेगाँव केस में गौतम नवलखा और आनंद तेलतंबडे की ज़मानत अर्ज़ी पर जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एमआर शाह की बेंच ने सुनवाई की और रिजेक्ट की।

    प्रधानमंत्री मोदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत दार्शनिक की संज्ञा देते हुए उन्हें सदाबहार ज्ञानी बताने वाले अरुण मिश्रा के न्यायिक फैसलों की लिस्ट बहुत लम्बी है। इसे आप महज़ एक इत्तफ़ाक़ ही समझें कि इन 6 सालों में सरकार के ख़िलाफ़ जितने भी अहम मुक़दमे हुए हैं, ज़्यादातर अरुण मिश्रा जी की कोर्ट में गए और उनकी कोर्ट से याची को नहीं सरकार को रिलीफ़ मिला है।

    यह सब देखते हुए लगता है कि जिस तरह रंजन गोगोई ने रिटायर होने से कुछेक महीने पहले विवादास्पद फैसले दिए और फिर राज्यसभा चले गए। अब अरुण मिश्रा भी कहीं न कहीं नियुक्त हो ही जायेंगे। यहां सवाल यह है कि क्या इन दोनों के किये गए फैसलों की दुबारा न्यायिक समीक्षा की जा सकती है? क्या कोई प्रावधान है कि सुप्रीम कोर्ट से मांग की जाये कि इन दोनों के ठीक रिटायर होने से पहले दिये गए फैसलों और इनके ट्रैक व प्लेसमेंट देखिए, अवश्य इनमें गड़बड़ होगी, इन्हें दुबारा सुना जाए?

    श्याम सिंह रावत

    ( फेसबुक वॉल से साभार )