मिसाल: अपने कर्मचारियों के लिए मसीहा बने के पी रामास्वामी

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    क्या  आपने तमिलनाडु निवासी के पी रामास्वामी का नाम सुना है? नहीं? तो लीजिए हम आपको बताते हैं कि ये सज्जन कौन हैं और इनका नाम आपके लिए जानना क्यों जरूरी है।
    के. पी. रामास्वामी का के.पी.आर. मिल्स के नाम से अंडरवियर-बनियान बनाने का कारोबार है। भारत ही नहीं, दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियां इनसे माल बनवाती हैं। ये तिरुपुर और कोयंबटूर स्थित 4 फैक्ट्रियों के मालिक हैं जिनमें 22,000 लोग काम करते हैं। इनमें से 4,500 मजदूर स्थानीय हैं और शेष 17,500 बाहर से आए स्थाई कर्मचारी हैं।
    देशभर में 23 मार्च को लगाये गये लॉकडाउन के कारण इनकी फैक्ट्रियों के एक भी कर्मचारी या मजदूर को जरा-सा भी कष्ट नहीं उठाना पड़ा क्योंकि रामास्वामी ने सभी के लिए आवश्यक सुविधाएं अपनी फैक्ट्रियों के ही हॉस्टलों में उपलब्ध करा दी थीं। इन्होंने सबको कहा कि लॉकडाउन जब तक भी चलेगा किसी को भी कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है। सबके भोजन, ठहरने, यहां तक कि मोबाइल की चार्जिंग भी मेरी तरफ से मुफ्त होगी।
    इन्होंने अपने 17,500 स्थाई वर्करों में से किसी एक को भी नौकरी से नहीं निकाला और किसी का एक भी दिन का वेतन/मजदूरी नहीं काटी।
    रामास्वामी ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में बताया कि उनका प्रति लेबर 13,500 ₹ मासिक खर्चा आया और इस प्रकार लगभग 2 महीने में कुल 30 करोड़ रुपया खर्च हो गया।
    जब रामास्वामी से पूछा गया कि उन्होंने इतना नुकसान क्यों सहन किया? तो उन्होंने कहा—”मैंने दो बातें सोचीं। एक तो यह मेरी नैतिक जिम्मेदारी थी कि मैं इनको बेरोजगार न करूं, आखिर मुझे इतना बड़ा बनाने में इन लोगों का ही तो हाथ है। फिर मुझे यह भी समझना था कि लॉकडाउन के बाद मुझे भी स्किल्ड लेबर नहीं मिलेगी।”
    इस कंपनी का वार्षिक टर्नओवर 3,250 करोड़ रुपए है लेकिन बड़ी बात है कि के. पी. रामास्वामी ने कर्मचारियों व मजदूरों के बारे में उच्च स्तरीय मानवीय दृष्टिकोण अपनाया। 
    भारत ऐसे ही लोगों के सहारे चल रहा है। अब बताइए कि ऐसे उच्च आदर्शों को जीवन का अभिन्न अंग बनाकर दूसरों के प्रेरणास्रोत व्यक्ति के विषय में सबको पता होना चाहिए कि नहीं?
    (श्याम सिंह रावत की फेसबुक वॉल से)