स्मृति दिवस: नेता जी  की अपने समकालीनों से मतभिन्नता तो थी पर सम्मान भी था

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    ज नेता जी सुभाष चंद्र बोस का स्मृति दिवस है. 18 अगस्त को 1945 में नेता जी सुभाष चंद्र बोस के विमान दुर्घटना में मारे जाने की हृदयविदारक खबर आई थी.

    सुभाष चंद्र बोस देश की आजादी के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे. आजाद हिंद फौज के एक कमांडर, मेजर जनरल शाहनवाज़ खान ने “माई मेमोरीज़ ऑफ आई.एन.ए. एंड इट्स नेताजी” (आई.एन.ए. और उसके नेता जी,मेरी स्मृतियों में) नाम से एक किताब लिखी. उक्त पुस्तक में आई.एन.ए. और उसके संचालन में नेता जी की भूमिका का विस्तृत ब्यौरा है. नेता जी की कार्यशैली और सोच-समझ का भी अंदाजा उक्त पुस्तक से होता है.

    जनरल शाहनवाज़ खान की पुस्तक से पता लगता है कि नेता जी भले ही भारत को आजाद कराने के अभियान में जापान की मदद ले रहे थे,लेकिन जापान के शासकों और वहाँ की फौज पर वे न आँख बंद करके भरोसा कर रहे थे और ना ही उन पर पूरी तरह निर्भर थे. जनरल शाहनवाज़ खान लिखते हैं कि नेता जी ने उनसे( आई.एन.ए. के सैनिकों से) कहा कि जापानी जानते हैं कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य उनकी सुरक्षा के लिए खतरा है क्यूंकि भारत को जापान के खिलाफ आपूर्ति और ऑपरेशन के बेस के तौर पर अंग्रेज़ इस्तेमाल कर सकते हैं. नेता जी ने कहा कि जापानी अपनी सुरक्षा के लिए ही अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में हमारी  मदद कर रहे हैं. इसलिए जितनी मदद वे हमारी कर रहे हैं,उतनी ही हम उनकी भी कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि जापानी किसी मौके पर धोखा न दे सकें या हमारा शोषण न कर सकें,इसका एकमात्र उपाय अपनी ताकत बढ़ाना है.

    जनरल शाहनवाज़ खान उन विभिन्न अवसरों का जिक्र करते हैं,जब जापानियों के अनावश्यक हस्तक्षेप या आई.एन.ए. को कमतर समझे जाने का नेता जी ने खुला एवं सफल प्रतिवाद किया. ऐसे ही एक वाकये का जिक्र करते हुए जनरल खान लिखते हैं कि एक मौके पर जापानियों ने नेता जी से कहा कि जापानी सेना, आई.एन.ए से वरिष्ठ सेना है,इसलिए जब जापानी और आई.एन.ए के समान रैंक के अफसर मिलें तो आई.एन.ए वाले पहले सल्यूट करें. नेता जी ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि इसका अर्थ है कि आई.एन.ए, जापानी सेना से कमतर है. उन्होंने कहा कि दोनों सेनाओं के अफसर एक साथ सल्यूट करेंगे और जापानियों ने यह बात मान ली.

    एक सम्मेलन में तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री जनरल तोजो ने कहा कि आज़ाद भारत में नेता जी सर्वेसर्वा होंगे. नेता जी ने इसका सार्वजनिक प्रतिवाद करते हुए कहा जनरल तोजो को ऐसा बयान देने का कोई अधिकार नहीं है,यह पूरी तरह भारत के लोगों का फैसला होगा कि भारत में कौन,क्या होगा.

    वर्तमान दौर में सत्ता और उसके समर्थकों द्वारा आज़ादी की लड़ाई के नेताओं को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने और उन पर कीचड़ उछालने का काम काफी ज़ोरशोर से किया जा रहा है. नेता जी का नाम ले कर भी ऐसा अभियान काफी चलाया जाता रहा है. लेकिन यह जानना दिलचस्प होगा कि जिन नेताओं से इतर राह, नेता जी ने ली क्या नेता जी के मन में उनके प्रति कोई कड़ुवाहट थी ? तथ्यों पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि कड़ुवाहट तो दूर की बात है,नेता जी के मन में आज़ादी के आंदोलन के अन्य नेताओं के प्रति अपार सम्मान था. इसका अंदाज नेता जी की आज़ाद हिंद फौज के रेजीमेंटों के नाम से लगा सकते हैं. आई.एन.ए की तीन रेजीमेंटों का नाम था- गांधी गुरिल्ला रेजीमेंट, आज़ाद गुरिल्ला रेजीमेंट (मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के नाम पर) और नेहरू गुरिल्ला रेजीमेंट.

    गांधी के साथ उनका तीखे वैचारिक संघर्ष सर्वविदित है. लेकिन उसके बावजूद गांधी के प्रति उनके मन में सम्मान था. आई.एन.ए के रेडियो से वे गांधी के नाम संदेश प्रसारित करते रहे. ऐसे एक संदेश वे कस्तूरबा गांधी की मृत्यु पर उन्होंने शोक भी जताया.

    जनरल शाहनवाज़ खान ने लिखा है कि आज़ाद हिंद फौज बनाने के घटनाक्रम को  नेता जी ने जनवरी 1944 की एक चांदनी रात को अफसरों के साथ डिनर करते हुए याद किया. नेता जी ने कहा कि 1935 तक वे इस नतीजे पर पहुँच चुके थे कि देश के बाहर सेना संगठित करके देश की आज़ादी की लड़ाई को आगे बढ़ाना चाहिए. नेता जी ने गांधी जी से इस विषय पर चर्चा की. गांधी ने कहा कि वे नहीं समझते कि इन तरीकों से देश को  आज़ादी मिल सकती है. लेकिन फिर भी यदि नेता जी इस तरह से देश को आज़ाद कराने में कामयाब हो गए तो वे(गांधी) पहले व्यक्ति होंगे जो उन्हें बधाई देंगे. जनरल शाहनवाज खान ने लिखा कि गांधी की इस बात से नेताजी इस नतीजे पर पहुंचे कि देश को आज़ाद कराने के इस अभियान के लिए गांधी जी का आशीर्वाद, उन्होंने हासिल कर लिया है.

    इस ब्यौरे से स्पष्ट है कि देश को आज़ाद कराने के तरीकों पर गंभीर मत भिन्नता होने के बावजूद भी आज़ादी की लड़ाई के नेताओं में न कोई परस्पर कटुता थी और ना ही वे एक-दूसरे पर वैसा कीचड़ उछालते थे,जैसा कि आज उनका नाम ले कर वो उछाल रहे हैं,जिनकी धारा का उस लड़ाई में सांप्रदायिक विभाजन और माफ़ीनामों का ही इतिहास है.

    ….नुक्ता-ए-नजर में  इंद्रेश मैखुरी

    ( फेसबुक पोस्ट से साभार )