प्रेरक प्रसंग: अमेरिकी सीनेट में अब्राहम लिंकन का ऐतिहासिक भाषण

    276
    0

    प्रस्तुति: अनंत आकाश

    अब्राहम लिंकन के पिता जूते बनाते थे। वे जब राष्ट्रपति चुने गये तो अमेरिका के अभिजात्य वर्ग को बड़ी ठेस पहुंची। सीनेट के समक्ष जब वे अपना पहला भाषण देने खड़े हुए तो एक सीनेटर ने ऊंची आवाज़ में कहा—”मिस्टर लिंकन! याद रखो कि तुम्हारे पिता मेरे और मेरे परिवार के जूते बनाया करते थे।” इसी के साथ अमेरीकन सीनेट भद्दे अट्टहास से गूंज उठी लेकिन लिंकन किसी और ही मिट्टी के बने हुए थे। उन्होंने कहा—”मुझे मालूम है कि मेरे पिता जूते बनाते थे। सिर्फ आप के ही नहीं यहां बैठे कई माननीयों के जूते उन्होंने बनाये होंगे। वे पूरे मनोयोग से जूते बनाते थे। उनके बनाये जूतों में उनकी आत्मा बसती है। क्या आपको उनके काम से कोई शिकायत है? उनका पुत्र होने के नाते मैं स्वयं भी जूते बना लेता हूं और यदि आपको कोई शिकायत है तो मैं उनके बनाये जूतों की मरम्मत कर देता हूँ। मुझे अपने पिता और उनके काम पर गर्व है।”

    सीनेट में उनके इस तार्किक भाषण से सन्नाटा छा गया और इस भाषण को अमेरिकी सीनेट के इतिहास में सबसे बेहतरीन भाषण माना गया है. और फिर उसी भाषण से एक थ्योरी निकली Dignity of Labour (श्रम का महत्व)। इसका असर यह हुआ कि अमेरिका में जितने भी कामगार थे, उन्होंने अपने पेशे को अपना सरनेम बना दिया जैसे—कोब्लर, शूमेकर, बुचर, टेलर, स्मिथ, कारपेंटर, पॉटर आदि। अमेरिका में आज भी श्रम को धर्म से ज्यादा महत्व दिया जाता है, इसीलिए वह दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है।

    इसके विपरीत हमारे देश मैं आज भी मोची, सफाईकर्मी, धोबी, नाइ आदि जो भी श्रम करता है उसको नीच और छोटी जाति का समझा जाता है। और तो और धार्मिक अनुष्ठानों से देश के प्रथम नागरिक को बंचित रखा जाता है. धर्म राजनीती का एक खिलौना बन गया है. ऐसी गलत मानसिकता के साथ हम दुनिया के नंबर एक देश बनने का सिर्फ सपना तो देख सकते हैं लेकिन उसे पूरा नहीं कर सकते. धर्मो का राजनीतिकरण, अस्प्रशयता, जाति पांत, ऊंच-नीच का भेदभाव किसी भी राष्ट्र के निर्माण की बहुत बड़ी बाधा है।