दृष्टिकोण: किसी धर्म के आधार पर नहीं, संविधान से चलता है देश

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    प्रतीकात्मक फोटो
    हिमांशु कुमार की फेसबुक पोस्ट-
    यह पोस्ट ख़ास तौर से मुसलमानों के लिए लिखी गई है

    आपको और हमें सदियों तक साथ रहना है

    मैं अपनी बात पेरिस में हुई घटना से शुरू करना चाहता हूँ

    वहाँ एक स्कूल में एक टीचर ने अभिव्यक्ति की आजादी समझाने के लिए कई साल पहले एक फ्रांसीसी पत्रिका में छपी मोहम्मद साहब के कार्टून का संदर्भ बताया

    याद रखिये जैसा शोर मचाया गया है कि उस टीचर ने कार्टून बनाया वह झूठ बात है उसने कार्टून नहीं बनाया था

    एक नौजवान ने उस टीचर का गला काट दिया

    बाद में पुलिस मुठभेड़ में वह नौजवान भी मारा गया

    इस घटना पर लोगों ने सोशल मीडिया में इसके खिलाफ लिखा

    इस पर बहुत सारे मुसलमानों ने टीचर की इस हत्या के उस नौजवान के काम को सही बताया

    कुछ मुसलमानों ने सीधे सीधे इसे अपनी शान मुसलमानों की हिम्मत धर्म की रक्षा आदि के रूप में बताया

    कुछ ने थोडा नर्म रुख दिखाते हुए अप्रत्यक्ष रूप से इस घटना पर टीचर को ही कसूरवार बताया और कहा कि उसने कार्टून बना कर उस नौजवान को क्यों भड़काया

    हम यह नहीं कह रहे कि सारे मुसलमानों ने इस घटना का समर्थन किया लेकिन सोशल मीडिया पर काफी बड़ी तादात में ऐसे मुसलमान सक्रीय थे

    इस पूरी घटना पर अब शांत दिमाग़ से सोचने की जरूरत है

    एक शब्द होता है पोलिटिकली करेक्ट होना

    अब हम सब अलग अलग समुदाय एक साथ रहते हैं

    हिन्दू मुसलमान सिख इसाई बौद्ध जैन अलग अलग जातियों के लोग, महिलाएं, ट्रांसजेंडर, बच्चे, विकलांग यह सब अलग अलग समुदायों के लोग अब एक साथ रहते हैं

    यह सभी समुदाय एक संविधान कानून और एक ही सरकार के मार्फ़त आपसी रिश्ते निर्धारित करते हैं

    और इन सभी समुदायों के बीच एक ही रिश्ता है वह है बराबरी का

    इसलिए आपने ध्यान दिया होगा कि इस बराबरी के पक्ष में सभी समुदाय आवाज उठाते हैं बराबरी ना होने की शिकायत करते हैं सरकारें भी बराबरी का वादा करती है

    अब अगर कोई एक समुदाय इस बराबरी के खिलाफ बोलता है तो बाकी के लोग उसे शर्मिंदा करने लगते हैं

    जैसे हिन्दू समुदाय के कुछ लोग जब जाति के आधार पर भेदभाव करते हैं तो बाकी लोग उसकी लानत मलानत करने लगते हैं

    अभी आपने हाथरस के मुद्दे पर सवर्णों की फजीहत होते देखी है

    या कोई समुदाय अपनी महिलाओं को परदे में रखना चाहता है तो बाकी के समुदाय उसकी लानत मलानत करते है

    इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था में मुसलमान एक समुदाय का नाम है

    हिन्दू एक समुदाय का नाम है

    आपका मजहब कितना महान है दुसरे समुदाय का मजहब आपसे कम महान है यह अब बहस ही नहीं है

    बहस यह भी नहीं है कि अल्लाह ज्यादा महान है या ईश्वर ज्यादा महान है

    यह भी बहस नहीं है कि पैगम्बर ज्यादा महान है या राम ज्यादा महान है

    अब आपके दुसरे समुदाय के साथ रिश्ते आपके मजहब की महानता के आधार पर निर्धारित नहीं होंगे

    अब मुसलमानों के रिश्ते दूसरे समुदायों के साथ संविधान के आधार पर निर्धारित होंगे

    जब दूसरा समुदाय आपसे जानना चाहता है कि अगर दूसरे समुदाय का कोई व्यक्ति आपकी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचा देगा तो आप क्या करेंगे?

    तो आपको पोलिटिकली करेक्ट उत्तर देना है

    आपको कहना है कि हम कानून से शिकायत करेंगे और कानून को अपना काम करने का आग्रह करेंगे

    लेकिन अगर आप कहेंगे कि किसी दूसरे समुदाय के टीचर ने हमारे समुदाय के एक नौजवान की भावना को नाराज कर दिया और उसने टीचर का गला काट दिया और यह ठीक ही हुआ

    आपका यह जवाब सुनकर आपके साथ रहने वाले दूसरे समुदाय के लोग आपसे चिढ़ जायेंगे

    दूसरे समुदाय के लोग कहेंगे कि हम आपके साथ रहते हैं, कल को अगर गलती से हमने आपकी भावना को ठेस पहुंचा दी तो आप हमारा भी गला काट देंगे

    आप भले ही गला ना काटें

    लेकिन आपने खुद को पोलिटिकली इनकरेक्ट साबित कर दिया

    आपकी इसी पोलिटिकल इन्करेक्टनेस का फायदा संघ और भाजपा उठाती है

    वह हिन्दुओं को डराती है और कहती है कि अगर हम नहीं होंगे तो मुसलमान आपको मार देंगे

    इसलिए हम लोग जो चाहते हैं कि कानून और संविधान का राज आये

    हम आपको संविधान और कानून तथा लोकतंत्र के हिसाब से जवाब देने के लिए कहते हैं

    इस लोकतंत्र में आपके पैगम्बर की या कुरआन की या इस्लाम की महानता की कोई कीमत नहीं है

    इस लोकतंत्र में राम की वेद की या हिंदु धर्म की महानता की भी कोई कीमत नहीं होनी चाहिए

    हमारी आरएसएस से लड़ाई इसी बात को लेकर है कि आप भारत की राजनीति को राम की महानता के आधार पर क्यों चलाना चाहते हैं

    लेकिन आरएसएस चालाकी से कहता है- देखो ये सेक्युलर लोग तो हमारे राम और हमारे हिन्दू धर्म के खिलाफ हैं

    हम आरएसएस की इसी चालाकी के खिलाफ जीवन भर संघर्ष करते आये हैं

    हमारा कहना है कि देश संविधान से चलेगा हिन्दू धर्म की या किसी भी धर्म की महानता के आधार पर नहीं

    इसलिए जब मुसलमान दूसरे समुदायों के साथ अपने सम्बन्ध अपने मजहब के आधार पर तय करने की बात करते हैं तो आरएसएस बहुत खुश हो जाता है

    आरएसएस यही चाहता है कि मुसलमान ज्यादा मजहबी बने और दूसरे समुदायों के साथ अपने रिश्ते मजहब के आधार पर तय करने लगें

    इससे आरएसएस दूसरे समुदायों को मजहब के आधार पर आसानी से एकत्रित कर सकता है

    और भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं दूसरा समुदाय बहुसंख्यक है

    तो इस खेल में मुसलमान पूरी तरह नुकसान में रहता है

    और आप देख सकते हैं कि आरएसएस ने आज मुसलमानों की राजनैतिक हैसियत शून्य कर दी है

    मैं लम्बे समय से देख रहा हूँ कि मुसलमान नौजवानों का एक तबका संविधान की धर्मनिरपेक्षता की तथा राजनैतिक नास्तिकता की बात करने वालों पर हमलावर हो गया है

    उसे लगने लगा है कि यह लोग हमारे मजहब की महानता को तवज्जो नहीं दे रहे हैं

    इसलिए वह बहस में कहता है कि कुरआन पढ़ो तब तुम्हें समझ में आएगा

    वह यह समझने के लिए तैयार नहीं है कि अब समाज संविधान से चलेगा कुरआन से नहीं

    यह जाल बिछाया आरएसएस ने है

    लेकिन इसमें भारत की राजनीति फंस गई है

    आरएसएस ने ना सिर्फ मुसलमानों की राजनैतिक हैसियत शून्य कर दी है बल्कि हिन्दुओं की राजनैतिक हैसियत भी शून्य कर दी है

    अब हिन्दू भी किसी राजनैतिक मुद्दे पर वोट देने की समझ खो चुके हैं

    अब हिन्दू भी सिर्फ मुसलमानों को कंट्रोल में रखने के मुद्दे पर वोट देने भर की हैसियत में पहुँच चुके हैं

    रोजगार, सस्ती शिक्षा, फसल की सही कीमत, औरतों की सुरक्षा जैसे मुद्दे पर अब वोट नहीं पड़ते

    मैंने शुरू में ही कहा कि हमें सदियों तक एक साथ रहना है

    हमारे मजहब अलग अलग हैं

    इसलिए हमारे आपसी रिश्ते मजहब के आधार पर नहीं तय हो सकते

    हमारे आपसी रिश्ते किसी ऐसी चीज के आधार पर तय होंगे जिसे हम और आप दोनों मानते हों

    वह चीज है संविधान

    तो हमारे रिश्ते संविधान के आधार पर ही बन सकते हैं, टिक सकते हैं, चल सकते हैं

    मजहब के आधार पर ना हमारे रिश्ते बन सकते हैं ना चल सकते हैं

    इसलिए जब हम लोग आपस में बात करें तो कभी भी मजहब के आधार पर बात ना करें बल्कि संविधान के लागू होने का आग्रह करें

    ( ये लेखक के अपने विचार हैं )