स्मरण:  जन्मदिवस पर महान साहित्यकार  मुंशी प्रेमचंद को सादर नमन ! 

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     मुंशी जी का आह्वान था- साहित्य का मैयार ( पैमाना) बदलना होगा।अर्थात राजा महाराजा की जगह किसानों मजदूरों आदि को नायक नायिका बना कर रचना करनी होगी।

     ‘मैं एक मजदूर हूं, जिस दिन कुछ लिख न लूं , उस दिन रोटी खाने का मुझे कोई हक नहीं।,

    कलम को उठाओ वतन के लिए।

     साहित्य जीवन की आलोचना है।

     प्रो चंद्रबली सिंह –  ‘मुंशी प्रेमचंद के लिए आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद और यथार्थोमुखी  आदर्शवाद समानार्थी हैं।( आदर्शवादी नहीं)
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    जन्म- 31 जुलाई 1880 लमही, बनारस
    निधन- 8 अक्टूबर 1936, बनारस

    मूल नाम- धनपत राय फिर  नवाब राय, अंत में मुंशी प्रेम चंद।

    प्रेमचंद नाम, ‘जमाना’ के संपादक मुंशी दयाराम निगम ने दिया।

    बांग्ला उपन्यासकार शरद चन्द्र ने ‘उपन्यास सम्राट’ कहा।

    उर्दू, फारसी, हिंदी, अंग्रेजी पर अधिकार।
    300 कहानियों, 15 उपन्यास, अनुवाद, नाटक रचना का काम।पहली कहानी ‘सौत’ 1901 में सरस्वती में प्रकाशित।सोजे वतन ( देश का दर्द, पांच कहानियों का संग्रह ) 1908 में, 1909 में हरदोई के डीएम द्वारा प्रतिबंधित। उर्दू में, लेखक ‘नवाब राय’ ।

    इसके बाद मुंशी प्रेमचंद का जन्म, उर्दू के साथ हिंदी में लेखन की शुरुआत।

    आखिरी कहानी- ‘कफन’ 1936 में।
    1934 में ‘मजदूर’ फिल्म की पटकथा का लेखन।
    1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक अध्यक्ष।

    सादर नमन !

    ( जनवादी लेखक संघ वाराणसी)

    (डॉ   महेंद्र प्रताप सिंह की फेसबुक वाल से)