स्मरण: अन्याय और व्यवस्था के खिलाफ विद्रोही तेवरों के कवि- शायर दुष्यंत कुमार

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    प्रस्तुति: बी.के. त्यागी

    हान कवि, गजल को महलोंं से मुक्त कराकर मंच पर लाने वाले श्रद्धेय दुष्यंत कुमार त्यागी का आज जन्मदिन है। ये वो महान शख्शियत थी जिसने वर्षो पहले आपातकाल के दौरान इस देश मेंं युवाओ को अन्याय के विरुद्ध एकजुट कर लोकतंत्र को बचाने के लिए अपनी गजलोंं व काव्य रचनाओं को ताबूत की आखिरी कील बनाया। इनके शेर आज भी सड़क से लेकर संसद तक मेंं गाये जाते हैंं।

    दुष्यंत कुमार जीवनी – Biography of Dushyant Kumar

    दुष्यंत कुमार त्यागी (1933-1975) एक हिन्दी कवि और ग़ज़लकार थे।

    दुष्यंत कुमार का जन्‍म उत्तर प्रदेश में बिजनौर जनपद की तहसील नजीबाबाद के ग्राम राजपुर नवादा में हुआ था। जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था। हिन्दी में भी उस समय अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था। उस समय आम आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि ही बच गए थे। इस समय सिर्फ़ ४२ वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की।

    प्रयागराज से उनके साहित्यिक करियर की शुरुवात हुई। उन्होंने बहुत से नाटक, कविताए ग़ज़ल और लघु कहानियाँ लिखी हैंं। साथ ही साहित्य की परिमल अकैडमी के सेमिनार में भी वे सक्रिय रूप से कार्यरत थे।

    उस समय के महत्वपूर्ण भारतीय न्यूज़लैटर आकाशवाणी और राजभाषा में उन्होंने नयी पत्ती के साथ काम किया है। उनकी कविताएंं सीधे दिल को छूती हैंं।वर्तमान में बहुत से प्रख्यात नव-हिंदी कवि जैसे डॉ. कुमार विश्वास और पुष्पेन्द्र नागर उन्हींं से प्रेरित हैंं।

    दुष्यंत कुमार ने, ‘जलते हुए वन का बसंत’,’ ‘सूर्य का स्वागत’, ‘आवाज़ों के घेरे’, ‘एक कंठ विषपायी’, ‘छोटे-छोटे सवाल’ कविताएँ लिखींं। जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था।

    दुष्यंत कुमार ने सिर्फ़ 42 वर्ष के जीवन में अपार ख्याति हासिल की लेकिन 30 दिसम्बर 1975 को भोपाल में उनकी मृत्यु हो गयी। लेकिन इतनी कम उम्र में भी उन्होंने हिंदी और उर्दू साहित्य में महान उपलब्धियाँ हासिल की हैंं। उन्हींं की वजह से ग़ज़ल को प्रसिद्धि मिली। वर्तमान में उनके शेरोंं और ग़ज़लों को भी साहित्य और राजनितिक कार्यक्रमों से जोड़ा जाता है।

    निदा फ़ाज़ली उनके बारे में लिखते हैं-

    “दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है। यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मोंं के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है। “

    अमिताभ बच्चन के प्रशंसक

    दुष्यंत कुमार ने बॉलीवुड महानायक अमिताभ बच्चन को उनकी फिल्म ‘दीवार’ के बाद पत्र लिखकर उनके अभिनय की तारीफ की और कहा कि- “वह उनके ‘फैन’ हो गए हैं।” दुष्यंत कुमार का वर्ष 1975 में निधन हो गया था और उसी साल उन्होंने यह पत्र अमिताभ को लिखा था। यह दुर्लभ पत्र हाल ही में उनकी पत्नी राजेश्वरी त्यागी ने उन्हीं के नाम से स्थापित संग्रहालय को हाल ही में सौंपा है। दुष्यंत कुमार और अमिताभ के पिता डॉ. हरिवंशराय बच्चन में गहरा प्रेम था। ‘दीवार’ फिल्म में उन्होंने अमिताभ की तुलना तब के सुपर स्टार्स शशि कपूर और शत्रुघ्न सिन्हा से भी की थी। हिन्दी के इस महान् साहित्यकार की धरोहरें ‘दुष्यंत कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय’ में सहेजी जा रही हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि साहित्य का एक युग यहां पर जीवित है।

    दुष्यंत कुमार ने अमिताभ को लिखे इस पत्र में कहा, ‘किसी फिल्म आर्टिस्ट को पहली बार खत लिख रहा हूं। वह भी ‘दीवार’ जैसी फिल्म देखकर, जो मानवीय करुणा और मनुष्य की सहज भावुकता का अंधाधुंध शोषण करती है।’ कवि और शायर ने अमिताभ को याद दिलाया, ‘तुम्हें याद नहीं होगा। इस नाम (दुष्यंत कुमार) का एक नौजवान इलाहाबाद में अक्सर बच्चन साहब के पास आया करता था, तब तुम बहुत छोटे थे। उसके बाद दिल्ली के विलिंगटन क्रेसेंट वाले मकान में आना-जाना लगा रहा। लेकिन तुम लोगों से संपर्क नहीं रहा। दरअसल, कभी ज़रूरत भी महसूस नहीं हुई। मैं तो बच्चनजी की रचनाओं को ही उनकी संतान माने हुए था।’ दुष्यंत कुमार ने लिखा, ‘मुझे क्या पता था कि उनकी एक संतान का कद इतना बड़ा हो जाएगा कि मैं उसे खत लिखूंगा और उसका प्रशंसक हो जाउंगा।

    रचनाएं

    इन्होंने ‘एक कंठ विषपायी’ (काव्य नाटक), ‘और मसीहा मर गया’ (नाटक), ‘सूर्य का स्वागत’, ‘आवाज़ों के घेरे’, ‘जलते हुए वन का बसंत’, ‘छोटे-छोटे सवाल’ (उपन्यास), ‘आँगन में एक वृक्ष, (उपन्यास), ‘दुहरी जिंदगी’ (उपन्यास), मन के कोण (लघुकथाएँ), साये में धूप (गजल) और दूसरी गद्य तथा कविता की किताबों का सृजन किया।

    प्रमुख कविताएँ

    ‘कहाँ तो तय था’, ‘कैसे मंजर’, ‘खंडहर बचे हुए हैं’, ‘जो शहतीर है’, ‘ज़िंदगानी का कोई’, ‘मकसद’, ‘मुक्तक’, ‘आज सड़कों पर लिखे हैं’, ‘मत कहो, आकाश में’, ‘धूप के पाँव’, ‘गुच्छे भर’, ‘अमलतास’, ‘सूर्य का स्वागत’, ‘आवाजों के घेरे’, ‘जलते हुए वन का वसन्त’, ‘आज सड़कों पर’, ‘आग जलती रहे’, ‘एक आशीर्वाद’, ‘आग जलनी चाहिए’, ‘मापदण्ड बदलो’, ‘कहीं पे धूप की चादर’, ‘बाढ़ की संभावनाएँ’, ‘इस नदी की धार में’, ‘हो गई है पीर पर्वत-सी’।

    उपसंहार:

    कवि दुष्यन्त कुमार एक ऐसे रचनाकार रहे हैं, जिन्होंने गज़ल का परम्परागत रोमानी भावुकता से बाहर लाकर आम आदमी से जोड़ने का कार्य किया है । स्वातंत्र्योत्तर भारत में आम आदमी की पीड़ा, शासकों का दोहरा चरित्र, चारित्रिक पतन, देश की दुर्दशा को देखकर कवि चुप नहीं रहना चाहता है; क्योंकि उन्हीं के शब्दों में:

    मुझमें बसते हैं करोड़ोंं लोग, चुप रहूं कैसे ?

    हर गज़ल अब सल्तनत के नाम बयान है ।

    दुष्यन्त कुमार त्यागी सचमुच ही एक साहित्यकार थे।  स्वधर्म से अच्छी तरह वाकिफ, जिसे उन्होंने निभाया भी है । उनका प्रदेय साहित्य जगत् में अमर रहेगा ।
    शत शत नमन ।

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    प्रखर लेखक व वक्त मनोज त्यागी जी की वाल से,