पहनावा: देहरादून की सुनीता बिष्ट ने आर्डर की तीन लाख रुपये की सीताम्बरी टीशू साड़ी

पहनावा: देहरादून की सुनीता बिष्ट ने आर्डर की तीन लाख रुपये की सीताम्बरी टीशू साड़ी
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राजधानी में राजपुर रोड स्थित होटल में लगायी गयी सिल्क प्रदर्शनी

महोत्सव में प्रदर्शित हुए देश के 12 विभिन्न राज्यों के मशहूर सिल्क हथकरघा उत्पाद

देहरादून। भारतीय साड़ी एक सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व का प्रतीक है और महिलाओं को उनकी संस्कृति का एक महान प्रतीक मानने का मौका देती है। इन परंपराओं के ममत्व की पहचान मुख्य रूप से उनकी स्थानीय कलाओं, शिल्पकला और वस्त्रों से होती है। पसंद के मामले में वस्त्र, विशेष रूप से सिल्क, देशभर में प्रमुख स्थान रखता है। भारतीय राज्यों में सिल्क हथकरघाओं की प्रदर्शनी महोत्सव एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रम है, जो देहरादून में एक सप्ताह तक चला और यादगार रहा!

राजपुर रोड स्थित होटल में इस सिल्क प्रदर्शनी महोत्सव में देश के 12 विभिन्न राज्यों के मशहूर सिल्क हथकरघाएं प्रदर्शित हुईं। इस महोत्सव में बुनकरों द्वारा तैयार की गई साड़ियों का ऐतिहासिक महत्व था और इनकी खूब बिक्री भी हुई।

देहरादून की सुनीता बिष्ट ने हथकरघा बुनकर विकास सहकारी समिति लिमिटेड, मोहम्मद स्वेलेश अंसारी, बनारस को तीन लाख रुपये की साड़ी का ऑर्डर दिया है। इस सीताम्बरी टीसू साड़ी की विशेषता यह है कि इनमें विशेष रूप से चांदी का उपयोग किया जाता है। 3 लाख की इस साड़ी में लगभग 400 ग्राम चांदी होती है। ऐसी साड़ियां मुख्यतः बड़े लोग खरीदते हैं, क्योंकि यह महंगी और इसाबगोली अपनाने वाली होती है। इसे पहनने में महिलाओं को अच्छा लगता है और इसे एक प्रतिष्ठित भूमिका के रूप में भी देखा जाता है।

मरून कलर की इस साड़ी के लिए एडवांस बुकिंग के लिए देहरादून की सुनीता बिष्ट ने 50 हज़ार रुपये दिए हैं। बनारस में दो बुनकर कुल छह महीने में यह साड़ी तैयार करेंगे। बनारस जाकर काम शुरू करने का वीडियो , सुनीता बिष्ट को भेजेंगे। साड़ी का बीच का काम दिखाने के लिए बुनकर बनारस से देहरादून ट्रेन से आएंगे और होटल में रहेंगे। ट्रेन के टिकट और होटल का खर्चा साड़ी की मालकिन सुनीता बिष्ट देंगी। जैसे जैसे साड़ी पर काम होता रहेगा, वैसे वैसे भुगतान होगा। 6 माह बाद पूरे तीन लाख रुपये दे दिए जाएंगे।

सीताम्बरी टिशू साड़ी के रूप में सजीव रंगों, कारीगरी की कठोरता और सिल्क के प्रतीक के कारण, यह महिलाओं के लिए आत्म-साक्षात्कार का रूप है। इससे न केवल हमारी संस्कृति और कौशल की महत्ता बढ़ती है, बल्कि यह भारतीय महिलाओं के लिए गर्व का प्रतीक भी है।

इस लेखक/ संपादक ने बनारस के मोहम्मद अंसारी की तीन लाख रुपये की इस साड़ी को करीब 16 मिनट तक देखा, और इसके बारे में जाना! अंसारी बताते हैं कि, देहरादून में इतनी महंगी साड़ी के कद्रदान कम हैं, लेकिन हैं। तब उन्होंने पूरी कथा बताई….
वे कहते हैं- ‘इसमें रेशे चाँदी के लगें हैं लेकिन यह और साड़ियों से हल्की है। वजन तुलवाकर उन्होंने बताया कि यह साड़ी अमर है, कभी खत्म नहीं होने वाली लाइफ है इस साड़ी की।
जिस तरह ऑफ वाइट की साड़ी है (यह चित्र में) ! इसी तरह की मरून साड़ी होगी सुनीता बिष्ट की, जिसे पहनकर देहरादून की सुंदर फिज़ाओं में वह अपना स्थान बतायेगी। सिल्क की और साड़ियां भी यहाँ बिकी हैं।

पिछले एक साल से कॉपरेटिव फेडरेशन का काम देख रहे एमडी आनंद शुक्ल कहते हैं कि, उत्तराखंड का अपना को-ओपरेटिव का ब्रांड ‘दून सिल्क’ का सहसपुर में कारखाना है, जो 1000 साड़ी का प्रोडक्शन स्थानीय रेशम किसानों से करा रहा है। खुद का भी आऊटलेट प्रेमनगर में है, जहाँ हाई क्वालिटी का सिल्क व उसके कपड़े मिलते हैं।
प्रत्येक राज्य की अपनी विशेष प्रकार की साड़ी की पहचान होती है जो उसके शैली और डिजाइन को सराहना करती है। उत्तर भारतीय साड़ी, जैसे की बनारसी साड़ी, दून सिल्क साड़ी, बंगला साड़ी और पंजाबी साड़ी, विभाजन की या गोईजा और राजस्थानी साड़ी जैसे पश्चिमी भागीदारी की सीमाएं बताती हैं। दक्षिण भारतीय साड़ी, जैसे कि कंजीपुरम साड़ी और केरला कसुवरी साड़ी, उनकी कला और दक्षिणी भारतीय शैली में निर्माण करती हैं। ऐसी जीवंत विविधता ही साड़ी को भारत के रूप और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बनाती है।

‘भारतीय महिलाएं सिल्क की साड़ियों को प्रिय मानती हैं, क्योंकि इनसे हमारी संस्कृति, ऐतिहासिकता और सौंदर्य जुड़ा होता है। सिल्क का उपयोग अद्वितीय रंगों और डिज़ाइन के साथ किया जाता है, जिससे धार्मिकता, परंपरा और सौंदर्य का संगम प्रकट होता है। इसलिए, सिल्क हथकरघा प्रदर्शनी महोत्सव उत्तराखंड राज्य में हर साल आयोजित किया जाता है।’
– डॉ धन सिंह रावत,सहकारिता मंत्री

उत्तराखंड सरकार

(शीशपाल गुसाईं के सौजन्य से)

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