Home Home वन अनुसंधान संस्थान में “वन भूदृश्य पुनरुद्धार” पर संगोष्ठी का आयोजन

वन अनुसंधान संस्थान में “वन भूदृश्य पुनरुद्धार” पर संगोष्ठी का आयोजन

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देहरादून – यहां स्थित वन अनुसंधान संस्थान (एफ.आर.आई.) के वन पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन प्रभाग की तरफ से मंगलवार को “वन भूदृश्य पुनरुद्धार” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का उद्घाटन संस्थान के निदेशक अरुण सिंह रावत ने किया।
अपने उद्घाटन भाषण के दौरान श्री रावत ने कहा कि फॉरेस्ट लैंडस्केप रिस्टोरेशन (एफएलआर) पारिस्थितिक कार्यक्षमता को पुनः प्राप्त करने की और ह्रास हो चुके वन भूदृश्यों के आस-पास के लोगों के कल्याण की निरंतर प्रक्रिया है। फॉरेस्ट लैंडस्केप रिस्टोरेशन का महत्व पेड़ लगाने से कहीं अधिक है । यह वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए पूरे भूदृश्य का पुनरुद्धार कर रहा है और समय के साथ कई लाभ और भूमि उपयोग की बेहतर अवसर उपलब्ध कराता है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि कुप्रबंधन और भूमि उपयोग परिवर्तन के कारण भूमि क्षरण प्रक्रियाओं की बढ़ोतरी से हमारी मृदा को खतरा है। यदि हमें भावी पीढ़ियों हेतु आवश्यक खाद्य उत्पादन, जलवायु न्यूनीकरण, स्वच्छ भूजल का प्रावधान और जैव विविधता क्षति को कम करना सुनिश्चित करना है तो इस ट्रेंड को उलटने के लिए तत्काल कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है ।
उन्होंने कहा कि घटती मृदा गुणवत्ता के कारण दुनिया की कृषि भूमि की संभावित उत्पादकता तेजी से कम हो रही है। श्री रावत ने बताया कि विश्व की 33% मृदा पहले ही ह्रास हो चुकी है। भारत के 329 मिलियन हेक्टेयर (मि.हे.) भौगोलिक क्षेत्र में से केवल 265 मि.हे. भूमि का कृषि, वानिकी, चारागाह और अन्य बायोमास उत्पादन के लिए उपयोग किया जा रहा है। भारत दुनिया की मानव आबादी का लगभग 17% और दुनिया के पशुधन का 20% तथा दुनिया के भौगोलिक क्षेत्र का केवल 2.5% भार वहन करता है। मानव के साथ-साथ पशुधन जनसंख्या की निरंतर वृद्धि, गरीबी और आर्थिक एवं व्यापार उदारीकरण के मौजूदा चरण में वानिकी, कृषि, चारागाह, मानव बस्तियों और उद्योगों में प्रतिस्पर्धात्मक उपयोग के लिए भारत के सीमित भूमि संसाधनों पर भारी दबाव बढ़ रहा है। इसके कारण बहुत अधिक भूमि क्षरण हुआ है।
उन्होंने कहा कि भारत में तीव्र गति से भूमि क्षरण का मुद्दा एक प्रमुख चिंता का विषय बन रहा है, जो 2030 तक भूमि क्षरण की तटस्थ स्थिति तक पहुँचने के लिए यूएनसीसीडी के हस्ताक्षरकर्ता के रूप में भारत की प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है। एफआरआई, देहरादून आईसीएफआरई के तहत अपने उपकेद्रों के साथ मिलकर विभिन्न डिग्रेडेड भूमि जैसे अधिक दबाव वाले कोयला खदान के डंप, चूना पत्थर की खदानें, खनिज की कमी से प्रभावित मृदाओं, डिग्रेडेड पहाड़ियों, जलग्रस्त क्षेत्रों, रेगिस्तानी रेत के टीलों आदि के लिए रेस्टोरेशन के उपयुक्त मॉडल विकसित कर रहा है।
श्री एन बाला, प्रभाग प्रमुख, वन पारिस्थितिकी एवं जलवायु परिवर्तन प्रभाग ने महत्वपूर्ण अब तक की उपलब्धियों और प्रभाग की वर्तमान गतिविधियों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। डॉ. एच.बी. वशिष्ठ ने विशेष रूप से भारतीय संदर्भ में वन भूदृश्य पुनरुद्धार की आवश्यकता और अवसरों पर प्रकाश डाला। कर्नल एच.आर.एस. राणा ने वन भूदृश्य पुनरुद्धार पर इको-टास्क फोर्स के अनुभवों को साझा किया। डॉ. आर.एस. रावत, ने सरकारी कार्यक्रमों, पहलों और बॉन चैलेंज के महत्व पर ध्यानाकर्षण किया। डॉ. सुरेश कुमार ने वन भूदृश्य पुनरुद्धार में जीआईएस और दूर संवेदी तकनीक पर विस्तार से जानकारी दी। डॉ. जी.पी. जुयाल ने सेमिनार के दौरान “फॉरेस्ट लैंडस्केप रिस्टोरेशन में मृदा नमी संरक्षण कार्यों की भूमिका” के बारे में बात की। संगोष्ठी में
पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. एस. सी शर्मा, निर्मल राम, अनुसंधान संगठन के प्रतिनिधियों एवं अन्य प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए और भविष्य के रोडमैप तैयार किए। संगोष्ठी में एफआरआई के अलावा, आईसीएआर-भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान, भारतीय दूर संवेदी संस्थान, राज्य वन विभाग, विद्यार्थी, शोधार्धी, इको-टास्क फोर्स, विश्वविद्यालय, गैर सरकारी संगठन आदि ने प्रतिभाग लिया।