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गुरू भगत सिंह कोश्यारी सीएम की कुर्सी पर अपने चेले पुष्कर सिंह धामी को बैठाने में हुए सफल

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वरिष्ठ विधायकों का सपना चकनाचूर
रूद्रपुर। गुरू की नजरों में अगर चेले की छवी बस जाये और चेला गुरू का विश्वास जीतने में कायम हो जाये तो गुरू सबकुछ अपने चेले पर कुर्बान कर देता है। ऐसा ही घटनाक्रम देवभूमि में घटित हुआ है। देवभूमि जो उत्तराखंड राज्य के नाम से जानी जाती है। इस प्रदेश की कमान महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के पास रही हैं। उस दौरान उनके शार्गिद पुष्कर सिंह धामी रहे हैं। गुरू ने मौका लगते ही अपनी पूर्व की कुर्सी पर अपने चेले का बिठाकर अपना सपना पूरा कर दिया हैं, जबकि वरिष्ठ विधायकों का सीएम की कुर्सी पर बैठने का सपना चकनाचूर हो गया हैं।
महाराष्ट के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की दिली इच्छा रही है वह एक बार उत्तराखंड के सीएम की कुर्सी पर बैठे और देवभूमि के लोगों की सेवा करें। उनका यह सपना एक वक्त आया था जब पूरे होने की करीब था। यह समय वह था जब कांग्रेस पार्टी के विधायकों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उस दौरान प्रदेश से लेकर देश की राजधानी तक भगत सिंह कोश्यारी का नाम सीएम की कुर्सी पर बैठने के लिये चल निकला था। इस दौरान लोगों ने भगत सिंह कोश्यारी से लेकर उनके प्रमुख भक्त पुष्कर धामी को बधाई तक देनी शुरू कर दी थी, लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दखल होने के बाद हरीश रावत की सरकार बच गई थी और भगत सिंह कोश्यारी का सीएम की कुर्सी पर एक बार पुनः बैठने का सपना पूरा नही हो पाया था। विधानसभा के 2017 के चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलने के बाद माना जा रहा था कि सीएम की कुर्सी पर भगत सिंह कोश्यारी विराजमान होगें, लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने त्रिवेंद्र सिंह रावत को सीएम की कुर्सी पर बैठाकर भगत सिंह कोश्यारी को राज्यपाल के पद पर ही बना रहने के लिये फरमान सुना दिया।
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने त्रिवेंद्र रावत को चार वर्ष के कार्यकाल पूर्ण होने से कुछ दिन पहले ही सीएम की कुर्सी से चलता कर दिया और तीरथ सिंह रावत को सीएम की कुर्सी सोंप दी। सांसद तीरथ सिंह रावत को विधानसभा का सदस्य बनने के लिये छह माह का समय था। इस दौरान सल्ट विधनसभा का चुनाव संपंन हुआ, लेकिन सीएम तीरथ सिंह रावत सल्ट विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की हिम्मत नही जुटा पाये, और वह विधानसभा का सदस्य नही बन पाये। विधानसभा के सदस्य नही बनना और चार माह के कार्यकाल में उनके कई ब्यान विवादित हो गये थे। जिसको लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व बैचेन हो गया और तत्काल ही पंाच दिन पूर्व तीरथ सिंह रावत को दिल्ली तलब कर लिया। यह घटनाक्रम तब घटित हुआ जब रामनगर में चिंतन शिविर चल रहा था। भाजपा के नेतृत्व ने मंथन के बाद तीरथ सिंह रावत को सीएम की कुर्सी से विदा करने का फरमान सुना दिया। इस फरमान के बाद तीरथ सिंह रावत शुक्रवार की शाम को दिल्ली से देहरादून आये और एक पत्रकार वार्ता करने के बाद राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया।
सीएम की कुर्सी खाली होने की भनक लगते ही महाराष्ट्र की राज्यपाल पूरी तरह सक्रिय हो गये और राष्ट्रीय नेतृत्व पर अपने चेले पुष्कर सिंह धामी की जमकर पैरवी करने में लग गये। राज्यपाल की पैरवी रंग लाई और उनका चेला विधान मंडल दल की बैठक में सीएम की कुर्सी पर बैठने का ऐलान कर दिया गया। कुल मिलाकर सीएम की कुर्सी पर गुरू नही चेला जरूर विराजमान हो गया ।